फिल्मे मनोंरजन का एक बेहद उपयुक्त साधन होती जा रही हे।
लोग संडे का प्लान कहि घूमने जाने की बजाए मूवी देखने का बनाने लगे है।
सब मूवी एक सी नही होती
आपको कुछ पसंद आती है , कुछ नही।और जो नही आती उनका रिव्यू आप ऐसे बताएंगे किसी को की सामने वाले को लगने लगेगा कि आपका सारा पैसा आपने इस मूवी में लगा दिया अब बर्बाद हो गऐ। फिल्मे वास्तविकता के आधार और बनती हो और उन्हें एक काल्पनिक ढांचे में ढाल दिया जाता है...
जैसे अभी टॉयलेट मूवी को ही देखिये मूवी ओरिजनल घटना पे आधारित थी पर उसकी स्टोरी को मनोरंजन की दृष्टि से काल्पनिक ढांचा दे दिया गया।
मुझे ऑब्सर्व करने की आदत है बहुत और कई मूवीज़ से में सीखा भी बहुत कुछ हें।
अब टॉयलेट को ही देख लीजिए
हम लोग भी आम जिंदगी में यही करते हे हमेसा "जुगाड़" बस जिंदगी भर इसी में बीत जाती है। कोई खाने का जुगाड़ कर रहा है कोई रहने का कोई मनोरंजन करने का।
कभी सोचा है आखिर मौत आ जायेगी और बस में जुगाड़ करता रहा जाऊंगा...।
जिंदगी में एक स्थिरता रहना चाहिए ये मेरा सोचना है।
पर लोगो का ओपीनियन ये भी हे इस भाग दौड़ में हम स्थिरता लाएंगे तो पीछे रह जायेंगे।
तो क्यों दौड़ना हे सबके जैसा अपनी मस्ती में चलो न दौड़ने वाले जल्दी पहुच जायेंगे आप थोड़ा लेट ही सही।
"बद्री नाथ की दुल्हनिया" मूवी जब देख के आया में तो कई रिव्यू पढ़े , हां देखने के बाद पढ़ा।
कुछ आलिया की तारीफ कर रहे थे कुछ वरुण की एक्टिंग की बात
पर किसी ने सोचा है
आलिया भागी क्यूँ , क्यूँ भागी वो तो मूवी में ही बता दिया गया। पर वो बापस भी आई अपने सपने को छूके बापस आयी ।
सोचना कभी क्या हमारे समाज में हे ऐसी लड़की और हैं तो सच में समाज इतना पिछड़ा है कि उन्हे खुद पंख फड़फड़ाना पड़ रहा है कुछ लहुलहान होके वही रह जाती है कुछ उड़ जाती है आज़ाद हो जाती है और पा ही लेती है खुद को खुद के सपनों को।
अभी हाल ही में एक मूवी आई थी "हाफ गर्लफ्रेंड"
कतई घटिया एक्टिंग मुझे तो पच ही नही रही थी ।
अगर कायदे से सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए एक्टिंग देखते हुए मूवी देखता तो इंटरवल के पहले दो बार और बाद में एक बार जरूर उल्टी कर देता ।
पर उसमे एक शानदार सीन आता है जब इंटरव्यू लेने वाला अर्जुन शाब से पूछता है कि "आपके राज्य की इतनी बुराई हे "
तब अर्जुन शाब जो जबाब देते है उससे सीख में किसी भी बात को अच्छे ढंग से कैसे बोला जा सकता है चाहे उसमे खराबी ही क्यू न हो।
किस तरह से अपनी बात सामने वाले को आप समझा सकते हे।
Saturday, September 30, 2017
मूवीज़
Wednesday, September 20, 2017
प्रेम
तुम कौन हो..?
क्यूँ हो.. ?
किस लिए हो..?
जैसी भी हो वैसी क्यों हो..?
क्या कभी सोचा है मेने तुम्हारे बारे में तुमसे मिलने से पहले..?
क्या मुमकिन है तुम्हे सोचना..?
कैसे मुमकिन है तुम तो कल्पना से परे हो
तुम्हारी नादानियां सबसे अलग है
तुम्हारी समझदारी कई बार मुझे अचंभित कर देती हैं..!
इतनी समझदार हो फिर लापरवाही कैसे कर लेती हो
हां तुम इंसान ही हो!!
तुम गलतियां भी करती हो
पर उन गलतियों में गुस्सा कैसे आ सकता है किसी को ,
बस ढोंग किया जा सकता है...!!
तुम इतनी अच्छी क्यों हो
या मुझे लगती हो..!
हां दुसरो को अच्छी क्यों लगोगी वो तुमसे प्रेम थोड़ी न करते हैं, पर प्रेम करता हु इसलिए अच्छी लगती हो...?
नही नही ऐसा नही है
तुम हो ही अच्छी..!
बस दूसरे तुम्हे जानते नही..।
क्या में तुम्हे जानने लगा हूं...?
हां , पर पूरा नही...
कितना विरोधाभाष है न किसी को पूरा न जानते हुए भी उसे जानने का दावा करना....!
पर तुम्हे कोई कैसे पूरा जान सकता है जिसने बनाया उसके लिए भी मुश्किल हो तुम्हे जानना..!
क्या हम जुड़े हैं एक दूसरे से...?
हां कितने करीब तो है हमारे दिल एक दूसरे से....!
तुम्हे सोच के लिखता हूं तो
जो जो सोचता हूं पूरा लिख हि नही पाता शब्दों की कमी हो जाती है..!
कभी मन करता है बारिश में भीगु तुम्हारे साथ ...!
कभी लगता है सुबह हो मेरी तुम्हारे साथ ..!
तुमसे ज़िद बेफिक्र होकर कर लेता हूं..!
प्यार तुम्हे बेइंतिहा करता हूं...!
गुस्सा कभी कभी हद कर लेता हूं.....!
इतने हसीन पल हे तुम्हारे साथ गिन नही सकता..!
कितना इश्क हे तुमसे बता नही सकता..
कभी मन करता है चिल्ला के कहु "हां प्यार है तुमसे"
फिर लगता हे धीरे से तुम्हारे कान में कहुँ
"हां प्यार है तुमसे"
ताकि तुम्हारे दिल की धड़कन भी महसूस कर पाऊ..!
खुद के सवालों के जबाब में उलझ जाता हूं..!
जब सवाल तुम्हारे ऊपर होते है....!
Friday, September 15, 2017
कुछ यूँ हुआ
शाम का समय हे में छत में चक्कर काट रहा हु सूरज को डूबते हुए देखते हुए । वैसे आदत नही हे यू छत में घूमना मेरी पर एक दिन पहले हुई हल्की बुदाबारी से आज की शाम का मौसम सुहावना सा हे ।
यू ही चक्कर काटते काटते अचानक हमे दो साल पहले जी बात याद आ गई ...
उस समय 11th में था में सुबह शाम कोचिंग और बीच का टाइम स्कूल में कट जाता था
उम्र होती है वो एक मतलब मेरी तो थी शायद मस्ती करने की थोडा किसी की छेड़खानी करने की, बस दिन रात यही सब दोस्तों के बीच चलता रहता था....
एक दिन क्या हुआ शाम को हम जब कोचिंग से लौट रहे थे चौराहे में एक लड़की दिखी ।वैसे लडकिया तो दिखती ही रहती थी पर वो थोडी अलग थी।
मतलब उसके कान आँख ज्यादा नही थे पर अलग थी।
सायकल में चल रही थी की अचानक सामने कोई गाड़ी अब गयी जिससे बो पैर से अपनी सायकल रोकने में कामयाब भी रही
आभार उसका भी देंगे उस गाड़ी बाले का जिसके कारण हमारा ध्यान उस लड़की पे गया
सायकल में सीट से उतर के पैर टेकी हुई ,
बाल थोड़े बिखरे से शायद हेअर स्टाइल रही होगी वो उसकी
लिपस्टिक डार्क थी ,
उसे इंग्लिश में कोनसा कलर कहते हे पता नही पर है बो कत्थई
था,,,
,जच रही थी उसमें वो ......
और
.आँखों में काला सुरमा
हाय बस लगे की जान ही निकल जाएगी अब तो.....
और मजे की बात ये हे की उस समय हम साऊथ की मूवी बहुत देखते थे
तो पहली नजर में मोह्हबत हो जाती थी उसमें विस्वास रखते थे भले ही न पता हो प्यार व्यार के बारे में ज्यादा
फिर ऊपर से हमारे फेवरेट सांग 90s की फिल्मों के " दिल ने ये कहा है दिल से मोह्हबत हो गई हे तुमसे " टाइप के ।
तो बस लगा हमे की कर बैठे मोह्हबत हम उससे
और तो और वो हमें रोज उस चौराहे में दिखने लगी हम आते थे वो जाती थी ........
फिर अचानक हमने गोर किया अवे साला ये तो शक्ल से सीनियर दिखती है ।
खासियत होती है चेहरे कि उम्र के साथ बदल जाता है तो हम जान लिए।
पर क्या हमें डायलॉग भी पता था वो वाला की प्यार उम्र नही देखता
फिर उसका चौराहे में दिखना जारी रहा और हमारा देखना ,की एक दिन यू ही हम मोहल्ले के बाहर दुकान गये तो वो वँहा से कही जा रही थी
हमारे दिमाग की घण्टी बजी" मामा रहती तो ये इधर कहि ही होगी"
पर तुरन्त अनुमान लगाना गलत था ।
एक दिन हम मोहल्ले के भैया के साथ जो उम्र में बड़े थे बस एक साल उनके साथ घूमने गये और वो नजर आ गई
जब उन्हें हमने थोड़ी बहुत स्टोरी सुनाई तो वोले
अबे एक साल बड़ी हे वे तुमसे हमारी क्लास की हे
फिर क्या था "मन में लड्डू फुटा"
हमने कहा एक साल कोई बात नही चलेगा उन्होंने घूरा और हम बात पलट दिए।
फिर रोज उनसे उसकी जानकारी मिलती गई नाम पता बाप का नाम बगैरा बगैरा ...
भेया हमारी मनोस्थिति भांपते हुए
वो बोले चल कॉपी लेने के बहाने तेरी बात कराता हूं
पर हम कहा एक no. के फट्टू बचपन से ही लड़कियों से बात नही कर पाते उनके सामने उनसे बड़े शर्मीले बन जाते थे तो बस बात वही अटक गई और मुलाकात न हो सकी ।
उस समय छुट्टियां आ गयी और हम गांव चले गए घूमने ,
जब हम आये तो वो नजर नही आयी
भेया ने बोला अवे उड़ गई तेरी मोह्हबत
हमने कहा "किसके साथ" तो बोले "अबे ढोर उसके बाप का ट्रांसफर हुआ है तो चली गई दुसरे शहर नाम भी काट ली स्कूल से"
हम बिलकुल शून्य हो गए घर आये शांति छाई रही हमारे अंदर !!
"साला पहली मोह्हबत और वो भी अधूरी हद हे वे" ये भी रह रह के मन में याद आ रहा था।
रह रह के डायलॉग भी याद आ रहा था ,"जब दिल टूटता है तो आवाज़ नही आती"
एक दो दिन रहा थोड़ा सा सीरियस और फिर न दिमाग में उसकी याद न दिल में ...
मतलब सब खत्म ,
लेकिन कहा देखो आज भी याद आ गई न उसकी
पर फिर हमने डिसाइड कर लिया ,अगर अब कभी इस तरह कोई लड़की पसन्द आये तो हम बात तो करेंगे उससे चाहे वो हा कर या न कर कम से कम यू मलाल तो नही रहेगा।
और हम ये भी नही चाहते की हमारी दूसरी मोह्हबत की कहानी भी अधूरी रह जाये ।
Saturday, September 9, 2017
अंधविस्वास
रॉबर्ट पेशे से एक शिक्षक थे
अंधविस्वास को पूरी तरह नकारने वाले..
छोटे कस्बे में जन्मे रॉबर्ट बड़े शहर में पढ़ाई करने के बाद फिर अपने जन्म स्थान आये थे । दूसरी क्लास से ही बड़े शहर की और रुख कर चुके रॉबर्ट जब अपना ग्रेजुएशन पूरा कर के गांव आये तो वँहा के लोगो का अंधविस्वास देख के चकित रह गए
21 वीं शदी जंहा लोग इससे पूर्ण तरह से नकार रहे हे ये लोग उस डर से जी रहे हे ।
पढ़े लिखे होने पर अपनी नैतिकता समझते हुए रॉबर्ट ने शहर की सुविधा को दरकिनार करके गांव में रहने की ठान ली और निश्चय किया कि अंधविस्वास को भगा के रहेंगे।
जीवन उपार्जन के लिए गांव के स्कुल में भी पढाने लगे सुबह स्कुल में पढ़ाते शाम को गांव वालों को भुत प्रेत नही होते उसके ऊपर ज्ञान देते....।
गांव वाले हामी भर के निकल जाते पर स्थिति नही बदलती ।
रात होने पर स्कुल के रास्ते में पड़ने वाला गांव के सबसे पुराने पेड़ के रास्ते में जाना मना था ,
तथाकथित कहानी यह थी की उसमे एक चुड़ेलन रहती है जो रात को जागती हे.......।
रॉबर्ट के ऊपर स्कुल की जिम्मेदारी थी ..,
वह आज काम में लेट हो गए थे रात के 10 बजे जब काम निपटा के लौटना चाहा तो अचानक उन्हें लगा दरवाजे में दस्तक हुई रॉबर्ट पुकारे
"कोन"
"कोन"
आवाज़ बस गई वापस नही आयी उन्होंने हवा का झोंका समझ के टेबल से ताला उठाया और दरवाजे में लटकाके अपनी सायकिल उठा के गांव को और निकल गए।
गांव वालों को समझाने की नई थ्योरी सोचते सोचते वो पुराने पेड़ के पार निकल गए तभी उन्हें लगा कोई उन्हें बुला रहा है
रॉबर्ट पलटे
वँहा अँधेरे के सिवा कुछ नही था
कुछ सेकंड देखने के बाद जैसे ही सामने अपना मुँह किया
और अपने सामने एक घुघराले बाल वाली लड़की को पाया जिसकी आँखे सामना लोगों से बड़ी थी कान बालों के पीछे छिपे होने के कारण नही दिख रहे थे,
रॉबर्ट चौके मन में भृम होने की आशंका के चलते एक हाथ से दोनों आंख मली और आँखे खोलते ही फिर आँखों के सामने सिर्फ अँधेरा था।
हवा का एक झोंक आया और उनके दाएं कान में कुछ कह कह के चला गया राबर्ट घवराये सायकल को जल्दी से जैसे ही आगे बढ़ाना चाहा लगा उसके चके बिना गीली जमीन के गर्त में फंसी हो और पूरे बल लगाने के बाद भी नही हिल रही हो..
तभी फिर पीछे से आवाज आई
"राबर्ट"
"राबर्ट"
इस बार राबर्ट पलट के पीछे का अंधेरा भी नही देख पाए
और कंपकपाते हाथो से सायकल छोड़ के लतखड़ाते पैरों से गांव की और भाग खड़े हुए...
सुबह गांव वालों ने देखा राबर्ट के घर ताला लटका था सायकल पेड़ के पास पड़ी थी...
और राबर्ट का कुछ पता नही था...!
सब्र और समझ
छोटे से गांव के एक क़स्बे में बाप अपने बेटे को डांट रहा था "आ गओ ठाकुर के छोरे से लड़के" गुस्से से तमतमाया बाप पास रखे लोटे से पान...
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शून्य हु न अंनत हु बस खुद में मगन हु आधार हु न आसमान हु में मध्य में विराजमान हूं लक्ष्य ज्ञात है पर रास्ता अज्ञात हे दुसरो पे यकीन नही...
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मोह्हबत अचानक से तुम्हारी याद आ जाना और फिर लाख कोशिश करने के बाद भी चेहरे पे आने वाली स्माइल को रोकना नामुमकिन होता है मेरे लिए . रोकना चा...
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11th मेँ था जब उसे पहली बार देखा था स्कुल का पहला दिन था स्कूल के किसी प्राइवेट स्कूल से पढ़ के आयी थी और हम ठहरे सरकारी स्कूल के छात्र । ...