Saturday, July 22, 2017

अधूरी पूरी मोह्हबत

11th मेँ था जब उसे पहली बार देखा था स्कुल का  पहला दिन था स्कूल के किसी प्राइवेट स्कूल से पढ़ के आयी थी और हम ठहरे  सरकारी स्कूल के छात्र ।
हमारे स्कुल में कभी लडकिया जुल्फे वाली नही रही मतलब हमने स्कुल की लड़कियों को हमेशा दो चोटियों में ही देखा था....
रिबन रेड कलर का होता था और उस समय अक्ल न थी तो दो चोटी वाली बन्दर की साली कह के परेशान करते थे और मास्टर के हाथ फिर पीटते भी थे
खेर जब हाई स्कूल और उसके  बाद हायर सेकेंडरी में आये तो थोड़ी सी अक्ल भी आई पर तब भी नही पता था कि लड़कियों से किस तरह बात करते हे और तब तो गांव के लड़के की जिम्मेदारी निभाते हुए शर्माते भी थे लड़कियों से ज्यादा ...
कुछ दिन तो देखते देखते ही गुजारे फिर थोड़ी बहुत बात की लेकिन ज्यादा न कर सके लेकिन उस थोड़ी ही बात पे लगा कुछ तो हे इसमें जिससे मोहब्बत की जा सकती है पर बात तो हो नही पाती थी मोहब्बत क्या घण्टा करते देखते देखते एक साल बीत गए 11th हम गिर पड़ के पास हुए और वो क्लास में टॉप 10 में आके और जब ये पता चला तब तो उम्मीद ही टूट गई की अब क्या भाव देगी ये 
पर उस समय 12th में थे तो लड़की से ज्यादा दिमाग  बोर्ड परीक्षा में रहता था ।
कोचिंग की भागदौड़ के बीच वो दिख जाती थी तो दिल को अजीब सा सुकून मिलता था पर कभी सोचा नही प्रपोज मारने को बस देख के खुश होने का ही मतलब था मोहब्बत 
हमारे शहर में लड़के 2 साल में 4 लड़कियां छोड़ देते है यंहा एक से ही बात करने की हिम्मत नही जूटा पा रहे थे और 12th की क्लास का लास्ट दिन भी आ गया उस दिन सोचा की आज इजहार कर ही दूंगा पर पूरे 5 घण्टे यही सोचने में बिता दिया की अब कहु तब कहु की कहु की नही और पक्षतावा लेके लौट आया फिर एग्जाम आ गए पेपर अपनी औकात के हिसाब से जाते रहे और इस तरह लास्ट पेपर भी आ गया ..
खुश दिख रही थी उस दिन वह बहुत और बड़ी उम्मीद से गया था उसके पास प्रपोज मारने 
पर क्या है पापा के सामने और लड़की के सामने कभी हम सर उठा के ढंग से बात नही कर पाते थे दोनों के कारण अलग अलग थे लेकिन परिणाम एक ही को बात नई कर पाते थे ।
               जैसे तैसे हिम्मत जुटा के पेपर में लिख के उसे देके आ गए  उस पेपर में दिल की बात के साथ अपना नम्बर भी लिख दिए थे और दूर खड़े होके उसे देखने लगे जब तक हम उसे देखते उसने पेपर में लिखा पढ़ लिया था और शायद वो पहली बार था जब उसकी और हमारी नजरे मिली थी.......
      उसके चेहरे से मायुसी ऐसे छलक रही थी मानो चाँद से चांदनी 
पर आँखों में बो चमक नही दिख रही थी आज जो में पहले दिन देखा था...
      फिर दोनों अपने अपने घर चले गए और हम उसके मैसेज का इंतजार करने लगे ।
रात 11 बजे मैसेज की टोन बजी और हम मोबाइल को ऐसे लपके जैसे छिपकली बरसाती कीड़े को झपटती है
मैसेज थोड़ा लम्बा था पर मेरी नजर पहले ही शब्द में अटक गई थी
"प्रिये"
ये शब्द पढ़ के हम  जमीन में पड़े उस बीज की तरह  हो गए थे जो प्रफुल्लित और अंकुरित होने के लिए आतुर था और उसे पानी की बूंद मिल गई हो...
अब ये मैसेज हम आँखों में एक नई चमक के साथ पढ़ रहे थे 
"प्रिये
तुम्हे ये शब्द अजीब लगा होगा न !!
कोई बात नही लगने दो....
पर तुम्हे नही लगता तुमने इजहार करने में देर करदी 
पुरे दो साल अगर तुम पहले  इजहार करते तो कितने हसिन लम्हे हम दोनों साथ में बिताते।
तुम्हे लगता था सिर्फ तुम मुझे देखते पर जब तुम नही देख रहे होते थे तब में तुम्हे देख रही होती थी 
में भी कभी तुम्हारी तरह हिम्मत न कर सकी आँख मिलाने की
पर में पढ़ी हु तुम्हारी आँखों में सच्चाई" 
अब तक मेरे चेहरे पे ये सब पढ़ के बड़ी सी मुस्कान आ चुकी थी..
"अभी भी कोई देर नही हुई है लेकिन हालात बदल गए है
शायद तुम्हे पता नही पर मेरा परिवार बहुत बुरे हालातो से गुजरा हे 
मेरी दी किसी से प्यार करती थी और पापा उस रिश्ते के लिए मान नही रहे थे
और इसी बीच उन दोनों ने शादी कर ली....
इस सब से मम्मी पापा पूरी तरह टूट गए थे और उन्हें परिवार वाले सहारा देने के बजाएं ताने देने लगे थे ...
अब भी सब ठीक नही है पापा ने निर्णय लिया हे की हम इस शहर से दूर बहुत दूर चले जायेंगे
में मिस करूँगी तुम्हे वँहा भी पर पहले मुझे अपने पापा को सम्हालना हे अगर भगवान ने चाहा तो हम फिर मिलेंगे और सिर्फ मुहब्बत अब आंखों से नही करेंगे बिन कुछ बोले मोहब्बत नही करेंगे
जो तुमसे कभी कह न सकी बो आज भी नही कह पाऊँगी..."
और फिर मेरी आँखो से एक बूंद आंसू मोबाइल में गिरा और मैसेज धुंधला हो गया...
कुछ न होके भी सबकुछ पास था
बिछड़ने का दुःख था उससे जिससे कभी मिला ही नही...

मोह्हबत


11th मेँ था जब उसे पहली बार देखा था स्कुल का  पहला दिन था स्कूल के किसी प्राइवेट स्कूल से पढ़ के आयी थी और हम ठहरे  सरकारी स्कूल के छात्र ।
हमारे स्कुल में कभी लडकिया जुल्फे वाली नही रही मतलब हमने स्कुल की लड़कियों को हमेशा दो चोटियों में ही देखा था....
रिबन रेड कलर का होता था और उस समय अक्ल न थी तो दो चोटी वाली बन्दर की साली कह के परेशान करते थे और मास्टर के हाथ फिर पीटते भी थे
खेर जब हाई स्कूल और उसके  बाद हायर सेकेंडरी में आये तो थोड़ी सी अक्ल भी आई पर तब भी नही पता था कि लड़कियों से किस तरह बात करते हे और तब तो गांव के लड़के की जिम्मेदारी निभाते हुए शर्माते भी थे लड़कियों से ज्यादा ...
कुछ दिन तो देखते देखते ही गुजारे फिर थोड़ी बहुत बात की लेकिन ज्यादा न कर सके लेकिन उस थोड़ी ही बात पे लगा कुछ तो हे इसमें जिससे मोहब्बत की जा सकती है पर बात तो हो नही पाती थी मोहब्बत क्या घण्टा करते देखते देखते एक साल बीत गए 11th हम गिर पड़ के पास हुए और वो क्लास में टॉप 10 में आके और जब ये पता चला तब तो उम्मीद ही टूट गई की अब क्या भाव देगी ये
पर उस समय 12th में थे तो लड़की से ज्यादा दिमाग  बोर्ड परीक्षा में रहता था ।
कोचिंग की भागदौड़ के बीच वो दिख जाती थी तो दिल को अजीब सा सुकून मिलता था पर कभी सोचा नही प्रपोज मारने को बस देख के खुश होने का ही मतलब था मोहब्बत
हमारे शहर में लड़के 2 साल में 4 लड़कियां छोड़ देते है यंहा एक से ही बात करने की हिम्मत नही जूटा पा रहे थे और 12th की क्लास का लास्ट दिन भी आ गया उस दिन सोचा की आज इजहार कर ही दूंगा पर पूरे 5 घण्टे यही सोचने में बिता दिया की अब कहु तब कहु की कहु की नही और पक्षतावा लेके लौट आया फिर एग्जाम आ गए पेपर अपनी औकात के हिसाब से जाते रहे और इस तरह लास्ट पेपर भी आ गया ..
खुश दिख रही थी उस दिन वह बहुत और बड़ी उम्मीद से गया था उसके पास प्रपोज मारने
पर क्या है पापा के सामने और लड़की के सामने कभी हम सर उठा के ढंग से बात नही कर पाते थे दोनों के कारण अलग अलग थे लेकिन परिणाम एक ही को बात नई कर पाते थे ।
               जैसे तैसे हिम्मत जुटा के पेपर में लिख के उसे देके आ गए  उस पेपर में दिल की बात के साथ अपना नम्बर भी लिख दिए थे और दूर खड़े होके उसे देखने लगे जब तक हम उसे देखते उसने पेपर में लिखा पढ़ लिया था और शायद वो पहली बार था जब उसकी और हमारी नजरे मिली थी.......
      उसके चेहरे से मायुसी ऐसे छलक रही थी मानो चाँद से चांदनी
पर आँखों में बो चमक नही दिख रही थी आज जो में पहले दिन देखा था...
      फिर दोनों अपने अपने घर चले गए और हम उसके मैसेज का इंतजार करने लगे ।
रात 11 बजे मैसेज की टोन बजी और हम मोबाइल को ऐसे लपके जैसे छिपकली बरसाती कीड़े को झपटती है
मैसेज थोड़ा लम्बा था पर मेरी नजर पहले ही शब्द में अटक गई थी
"प्रिये"
ये शब्द पढ़ के हम  जमीन में पड़े उस बीज की तरह  हो गए थे जो प्रफुल्लित और अंकुरित होने के लिए आतुर था और उसे पानी की बूंद मिल गई हो...
अब ये मैसेज हम आँखों में एक नई चमक के साथ पढ़ रहे थे
"प्रिये
तुम्हे ये शब्द अजीब लगा होगा न !!
कोई बात नही लगने दो....
पर तुम्हे नही लगता तुमने इजहार करने में देर करदी
पुरे दो साल अगर तुम पहले  इजहार करते तो कितने हसिन लम्हे हम दोनों साथ में बिताते।
तुम्हे लगता था सिर्फ तुम मुझे देखते पर जब तुम नही देख रहे होते थे तब में तुम्हे देख रही होती थी
में भी कभी तुम्हारी तरह हिम्मत न कर सकी आँख मिलाने की
पर में पढ़ी हु तुम्हारी आँखों में सच्चाई"
अब तक मेरे चेहरे पे ये सब पढ़ के बड़ी सी मुस्कान आ चुकी थी..
"अभी भी कोई देर नही हुई है लेकिन हालात बदल गए है
शायद तुम्हे पता नही पर मेरा परिवार बहुत बुरे हालातो से गुजरा हे
मेरी दी किसी से प्यार करती थी और पापा उस रिश्ते के लिए मान नही रहे थे
और इसी बीच उन दोनों ने शादी कर ली....
इस सब से मम्मी पापा पूरी तरह टूट गए थे और उन्हें परिवार वाले सहारा देने के बजाएं ताने देने लगे थे ...
अब भी सब ठीक नही है पापा ने निर्णय लिया हे की हम इस शहर से दूर बहुत दूर चले जायेंगे
में मिस करूँगी तुम्हे वँहा भी पर पहले मुझे अपने पापा को सम्हालना हे अगर भगवान ने चाहा तो हम फिर मिलेंगे और सिर्फ मुहब्बत अब आंखों से नही करेंगे बिन कुछ बोले मोहब्बत नही करेंगे
जो तुमसे कभी कह न सकी बो आज भी नही कह पाऊँगी..."
और फिर मेरी आँखो से एक बूंद आंसू मोबाइल में गिरा और मैसेज धुंधला हो गया...
कुछ न होके भी सबकुछ पास था
बिछड़ने का दुःख था उससे जिससे कभी मिला ही नही...


Friday, July 21, 2017

शून्य हु न अंनत हु..


शून्य हु न अंनत हु बस खुद में मगन हु
आधार हु न आसमान हु में मध्य में विराजमान हूं
लक्ष्य ज्ञात है पर रास्ता अज्ञात हे
दुसरो पे यकीन नही पर
खुद पे विश्वास है
सुनता सबकी हु पर मेरे
खुद के विचार हे
कठोर हूं लौह की तरह
तप्त से पिघल जाता हूं
किसी की बातो से सहमत जल्दी नही हो पाता हूं बिना तथ्य के  असहमत हो नही पाता हूं
प्रशंसक कम हु फिर भी लोग चापलूस न समझ ले इसलिये आलोचक बन जाता हूं
उस जमाने से नफरत हे मुझे जो बन्धनों में हे बांधती
रूढ़िवादियों से हु घिरा पर  रूढ़िवादी नही
में शून्य हु न अंनत हु बस खुद में मगन हूं😊

क्रमशः......

सब्र और समझ

छोटे से गांव के एक क़स्बे में बाप अपने बेटे को डांट रहा था "आ गओ ठाकुर के छोरे से लड़के" गुस्से से तमतमाया बाप पास रखे लोटे से पान...