Tuesday, November 28, 2017

one-sided love story


सामने थी वो बिलकुल ख़ाब सी
आँखों में काजल खुले बाल और ये बेफिक्री वाली स्माइल शुक्र जिसने उसे हंसाया हो पर एक पल को लगा उसकी हँसी बस मेरे लिए थी....
ढलती शाम उसकी ब्लैक टी शर्ट के ऊपर बालों पे लगे सफेद हेयरबेल्ट के पीछे फ़ीकी पड़ी जा रही थी।
 वो घर था उसका या नही , मुझे उसका
नाम भी  पता न था।
बस उसकी आँखें अपनी सी लगने लगीं थीं .
शायद 24 सेकेंड  से ज्यादा मेने उसे देखा नही था पर उसका, फ़ितूर 24 घण्टो बस आँखों में छाया रहता था.
मिलना नही था, बस देखना था एक बार और , और इस बार मन भर देखना था।
     इसे इतेफ़ाक कहें या भोले की मर्जी , आखिर कड़ाके की ठंडी वाली रात वो नजर आईं एक शादी में..।
 गुलाबी स्वेटर , आँखों में वही नादानी और जानलेवा काजल।
और वही स्माइल जिसका फ़ितूर बस दिमाग में छाया था।
मन किया एक बार कह दें जाके 'ज्यादा हँसा मत करो, किसी की नजर लग गई तो इल्ज़ाम हमारे ऊपर आएगा'.
पर बस शादी में बोरियत मिटाने के लिए अपने से बड़े लड़के से की गई चन्द लम्हो की दोस्ती वाले दोस्त को बस इतना कह सके
"ऐसे में भला किस नाचीज़ को इश्क नही होगा"

वो घूरा मुझे पर मेरा ध्यान अभी भी मन भरने में लगा था...
अटेंशन लेते हुए वो बोला
"देखो बे बहन है वो हमारी दोबारा नजर गड़ाए ने तो निकाल लेंगे ये और डाल देंगे आग में"
हमने कहा
"क्या अखियां या हमे"
"दोनों को" वो कह के चला गया
अब स्टोरी रोमेंटिंग से ज्यादा थ्रिलर सी लगने लगी..!
पर हमें फिर भी उससे ज्यादा अपने मन भरने पे ध्यान था।
      धमकी से फ़ायदा ही हुआ
अब हमें उसका घर और सरनेम पता चल गया था...।
मुझे शादियों में जाना कतई पसंद नही था, अब तो हर शादी में जाने को एक टांग से खड़ा होने लगा था।
पर इसे बदकिश्मति कहें या शनि की दशा ठंडी को शादियां अटेंड करते करते पैर अकड़ गये।हर रिश्तेदार से पहचान और ज्यादा हो गई। मम्मी के मामा की साली का देवर तो बेस्ट फ्रेंड बन गया था।
पापा के रिश्तेदार तो अब पूछना भी बंद कर दिए थे कि "बेटा पढ़ाई केसी चल रही तुम्हारी"
बस हुआ नही तो उसका दीदार।
बस यहीँ कोशिश नही किया कई दफ़ा कई बहाने से उसके घर के चक्कर भी काटे पर नही दिखी।
एक पल को तो लगा मेरे भोले का प्रकोप तो नही इस सोमवार नहाया भी नही और मंदिर भी नही गया । अगले सोमवार को नारियल लेके चढ़ा भी आया!
पर कुछ हुआ नई।
उम्मीद की लौ बस बुझने वाली थी...
कि फिर वो दिखी रामचरण टेलर के यंहा जंहा मम्मी के 10 बार कहने के बाद में।साड़ी लेने गया था। जन्नत इतनी पास से मैने पहली बार देखा था, ख़ुशी लाज़मी है ।
वो जा रही थी एक पल को लगा रोक लें पर किस हक से.
इसलिए बस जाने दिए।
टेलर चाचा अपनी रोने की आदत के अनुसार बोल रहे थे
"ये सलोनी दस नाटक करके कपड़े सिलवाती है और फिर भी मुँह बनाती है"
      पहली बार उनकी ये आदत पे मुझे चिढ़ नही हो रही थी.
आखिर नाम जो बता दिए थे.
 खोजी कुत्ते की तरह फिर भिड़ गए हम फेसबुक में ढूंढने उसे . अथक प्रयासों के बाद आखिर वो मिल ही गई,  रिक्वेस्ट से पहले उसे मैसेज भेजा
शक्ल पे भरोसा था कि रिप्लाई नही आएगा इसलिए एक नया रास्ता निकाल के बोल
"रामचरण चाचा बोल रहे थे की सूट कम्पलीट हो गया आके ले जाओ"
"वो में कल ही ले आयी और वो सूट नही था , घर के पर्दे थे"
उसका रिप्लाई पढ़ के सन्न रह गया में, इतनी बड़ी बेफकूफी जो कर बैठा था में!
शायद वो देख चुकी थी मेरी डीपी और बोली
" तुम वही हो न जो उस दिन टेलर की दुकान में घूर रहे थे. मेरे दो सींग लगे थे उस समय कि पुंछ ऊंगी थी जो आँखे हट नही रही थी तुम्हारी"

मेरा दांव उल्टा पड़ चुका था , लगा अगर अभी सामने रहता तो एक गाल में खींच के मार देती।
में बात बहलाने के लिए बोला
"अरे वो तो ऐसे ही"
"ऐसे ही क्या, मतलब आँखे है तो घुरोगे , समझ आता है कुछ उस समय लड़की को कैसा लगता होगा । तुम्हे कोई ऐसे घूरे तो कैसा लगेगा"
ऐसा लग रहा था की उसकी मुझसे जन्मों से दुश्मनी है , थमने का नाम ही नही ले रही थी।
"मुझे तो अच्छा लगेगा"
में फिर माहौल को ठीक करने की कोशिश करने लगा।
"हां कहना आसान है जब कोई ऐसे देखेगा तब समझ आएगी। अच्छा लगेगा बड़ा"
मुझें लगा  वो मम्मी से डाँट खाके आयी और यंहा गुस्सा निकाल रही है, फिर भी हमसे न झिला गुस्सा और झल्ला दिए..
"आँखे देखने को ही होती हैं , और तुम्हे न देखते वँहा तो उस बुड्ढे को देखते । मतलब इतने देर से माहौल शांत करने की कोशिश कर रहें है और तुम हो की बस चढ़े जा रही हो । हो गया कि अभी और बोलना है। एक काम करते हैं तुम बोलो में सुनता हूं आज रात भर यही करते है चलो शुरू करों"
"हां सुना लो तुम भी पहले ही पापा से डाँट खाई है अब तुम भी सुना लो मेरी तो कोई सुनता ही नही"
          बस यही से शुरू हो गई बात उसकी और मेरी…
वक्त बीतते बीतते पता चला जितनी वो खूबसूरत है उससे ज्यादा खूबसूरत उसका दिल है।
     वक्त के साथ लगा इश्क़ हो गया है मुझे क्योंकि पहले कभी इसका एहसास हुआ नही था मुझे..
और एक दिन मौका देख के बोल पड़े
"सुनो अब तुमसे बात नही होती तो अधूरा सा लगता है, ये एहसास थोड़ा अलग है जो पहले मुझे हुआ नही ।इश्क़ हो गया है तुमसे, गर्लफ्रेंड बनोगी मेरी"
"पागल हो, हम अच्छे दोस्त है। और तुम्हें पता है प्यार क्या होता है , मुझे तो सब बकबास लगता है जब अपनी फ़्रेंड्स को रोते देखती हूं, कितनी पाबंदियां होती है उनमें यार जितना वो अपने माँ बाप से नही डरती अपने बॉय फ्रेंड से डरती हैं। उन्हें देख के लगता है खुले होकर भी जेल वाली जिंदगी जी रही है।"
   उसकी बातों में चिढ़ थी, मोहब्बत क्या होती है उसे पता ही नही था।फिर मुझसे कहाँ होती...।
पता था मुझे कि ये उसकी नादानी थी बिना जाने उसने अंदाज लगा लिया था। मेरी समझदारी उसे समझा सकती थी पर में नही समझाया।
में कहना चाहता था हमारा प्रेम एक खुले पक्षी की तरह होगा जिसकी खुद की शर्तें होंगी जंहा उड़ना हो उड़ेगा.
पर में कह नही पाया न जाने क्यूँ।
बस खुद को मना लिया की मोह्हबत के बदले मोह्हबत की उम्मीद न करूं.

Thursday, November 23, 2017

मोह्हबत

मोह्हबत
अचानक से तुम्हारी याद आ जाना और फिर लाख कोशिश करने के बाद भी चेहरे पे आने वाली स्माइल को रोकना नामुमकिन होता है मेरे लिए . रोकना चाहता नही में पर अजीब लगता है न अकेले अकेले मुस्कुराना ।
जंहा तुम्हारे होने का अंदेशा हो वँहा तुम्हे ढूंढना और फिर न दिखने पर सोचना की में ढूंढ ही क्यूँ रहा था तुम यंहा कहा दिखोगी
अजीब लगता है ढूंढने का बाद जब सोचो की में ढूंढ क्यों रहा था।
नजरो के सामने आने के बाद नजरे न मिला पाना और फिर अफ़सोस करना की नजर मिला क्यूँ नही पाया.
अजीब लगता हे बाद मे अफ़सोस करना जबकि में अफ़सोस करना नही चाहता.
तुमसे बात करते समय दिल दिमाग बहुत तेज दौड़ते हे पर ये मुह दगा कर जाता है आवाज ही नही निकालता
अजीब लगता है जब बाद में सोचो की में तो ये बोलने वाला था बोला क्यूँ नही.
तुम्हे किसी बात के लिए मनाना और तुम्हारा न मानना
क्या पता क्यों खुद पे हँसी आती है उस समय.
गाने सुनते समय अचानक से तुम्हारा फेवरेट गाना जब हेडफोन पे बजता हे न तो मेरा फेवरेट गाना उसके आगे फीका पड़ जाता है.
कभी लगा नही मुझे की काश तुम ऐसी होती .
बस लगता है जैसी हो बेसी ही रहो तो अच्छा है थोड़ी सी ज़िद्दी.
अच्छा लगता है जब तुम्हारे मुह से मेरी बुराई सुनता हूं .
तुम्हे चिढ़ाना अच्छा लगता है और जब तुम चिढ़ के मुह बनाती हो उफ्फ.
जब तुम रूठ जाती हो मुझसे, तो जान ही निकल जाती है मेरी।
तुम्हे लिखना कभी आसान नही रहा मेरे लिए एक कोशिश हमेसा करते रहा हूं में

सब्र और समझ

छोटे से गांव के एक क़स्बे में बाप अपने बेटे को डांट रहा था "आ गओ ठाकुर के छोरे से लड़के" गुस्से से तमतमाया बाप पास रखे लोटे से पान...