शहर में दंगे फैल गए थे अफरा तफरी का माहौल था प्रसाशन ने जल्दबाजी में कर्फ़्यू लगा दिया था
पोलिश की गाड़ी सायरन के साथ अनाउसमेंट करते हुए गली गली से तेजी से गुजर रही थी लोग समझ नही पा रहे थे क्या करे अफरा तफरी के माहौल में सब अपने घर में अपनी जान बचाने को घुस गए
तभी कुछ दंगाई आये और गाड़ियों में तोड़ फोड़ शुरू कर दी
और आग लगाने लगे
एक ने रोक
"इसमें तो 786 लिखा है"
"बुझा बुझा जल्दी बुझा"
लीडर ने जल्दबाजी में कहा
तभी सायरन की धीमी आवाज़ तेज होने लगी ..
"रहने दे जलने दे उन्हें शक धर्म वालो पे जायेगा"
लीडर की आवाज़ आयी
और बो भाग खड़े हुए..
Wednesday, August 23, 2017
दंगाई का धर्म या मजहब
Thursday, August 3, 2017
हरिचरन की बेटियां
"बिंदिया जल्दी से धान समेट इंद्र बरस रहा है"
बापू की आवाज सुन के अपनी सच्ची सखी कपड़े की गुड़िया को छोड़ वो छट से आँगन में धान समेटने के लिए बापू का हाथ बंटाने लगी ,
अचानक तेज आई बारिश से भीगती धान के खराब होने से बिंदिया के बापू के माथे पे चिंता की लकीरें साफ दिख रही थी ।
बारिश की मोटी मोटी बूँद धान में पड़ते देख उसे लग रहा था। भगवान ने मुझे 5 बेटी न देके बेटे देता तो आज धान समेटने में 10 हाथ और होते उसके साथ
.
वो बस हमेशा यही सोचता रहता की शायद उसकी किश्मत ही फूटी थी ।
उसने न जाने कितने हकीमो के चक्कर लगाये की बेटा हो जायें पर भगवान को मंजूर ही कहा था और 5 वीं बेटी होते ही उसकी पत्नी भी भगवान को गुजर गई..।
वो पुरजोर कोशिश कर रहा था अपनी धान को बचाने की ,
क्योंकि वो धान को बेच के कमाए पैसों से अपनी सबसे छोटी बेटी की शादी करना चाहता था .....
अगर धान खराब हुई तो उसे फिर महाजन से लोन लेना पड़ेगा और वो नही चाहता महाजन के सामने हाथ पैर जोड़ना
उसे पिछले बार का मंजर याद आ गया जब उसे सबसे बड़ी बेटी की शादी करनी थी
उस साल सूखा पड़ा था ...
बेटी की उम्र भी साल दर साल बढ़ रही थी
उससे ज्यादा तो गांव वाले चिंता में थे उसकी बेटी की शादी करने को
तभी एक दिन उसके दूर के मामा आये जो उसकी बेटी के लिए रिश्ता लाये थे
रिश्ता अच्छे घर का लगा देख परख के रिश्ता तय भी कर दिया गया शादी अगले साल होनी थी उसे चिंता नही थी क्योंकि उसे खुद की किश्मत में भरोसा तो नही था पर भगवान में बहुत भरोसा था .की अगले साल जरूर कृपा बरसेगी
पर अगले साल बरसात का मौसम तो आया पर बरसात नही आयी
और उसकी खराब किस्मत जीत गई और भगवान हार गया
पर बो तो टूट गया था ।
शादी के कुछ महीने ही बचे थे और जेब में पैसे नही ,
गांव के लोगो ने उसे सलाह दी की रिश्ते बार बार नही आते महाजन से उधार लेके बेटी की शादी करदे उम्र बीत गई तो घर में बैठाना पड़ेगा...।
जब राशि में शनि की दशा होती है तो उस दशा को फलीभूत करने के लिए संसार का एक एक कण काम में लग जाता है...।
उसके साथ भी यही हो रहा था
उसे लगा शादी से निपटूंगा तो कर्जा उतार ही लूंगा
समाज के हिसाब से तो लड़की एक बोझ होती है माँ बाप के सर पे पिछले जन्म का कर्जा होती है जो इस जन्म में शादी करके उन्हें उद्धार होना रहता हैं
बस वो वही कर रहा था एक कर्ज को उतारने के लिए दूसरा कर्जा अपने सर चढ़ा रहा था...।
आखिर उसने हाथ पैर पटक के अपने उद्धार के लिए उधार ले ही लिया.....।
बड़ी बेटी समझदार थी उसकी वो सब कुछ देख रही थी समाज, अपने पिता को झुकते देखना और मांथे की लकीरों से परेशानी पढ़ रही थी...।
शादी नजदीक आ रही थी
बो कोठी में शादी के लिए लाया हुआ राशन रख रहा था
तभी दरवाजे पे दस्तक हुई
उसने उन्हें देख के पगड़ी उतार दी और बैठने को कहते हुए खुद भी बैठ गया।
वो उसके होने वाले समधी थे..,
उन्हें अचानक आया देख बो चौका जरूर था पर शादी के नजदीक आये हे तो कुछ जरूरी काम ही होगा ।
पानी को पूछते हुए उसने आने का कारण भी पूछ डाला
और बो बोले
"देखिये समधी जी आपको तो पता ही हे 2 साल से हालात क्या है हमारे क्षेत्र के'"
उसने आगे की बात जानने के लिए हामी में सर हिला दिया
"अकाल हमारे यंहा भी पड़ा है
अब एक और सदस्य बढ़ने वाला है हमारे घर समस्या तो होनी ही है
राशन से लेके सबकुछ की"
इस बार उसने हामी में सर नही हिलाया उसके माथे पे उभरती परेशानी को लकीरो ने ही हामी भर दी थी..।
समधी जी आगे बात बढ़ाते हुए बोले
"तो हम सोच रहे थे आप दहेज..."
इस बार उसने बात बीच में काट दी और बोला
"दहेज की बात तो समाज के बीच हो गई थी न हम एक बैल देंगे आपको "
समधी बोले
"अरे भाईसाहब बेल तो दूध भी नही देता आपको बेटी को क्या खिलाएंगे गोबर उसका करेंगे क्या हम ,आप एक काम करे बेल के साथ एक दुधारी गाय दे दीजिए और बाकि तो राशन आप दे ही रहे हे..।"
समधी जी की ये बात उसे निवेदनपूर्ण न होके आदेश वादक थी..
उसके माथे की लकीरों से अब तक पसीना निकल चूका था
महाजन से जो पैसे लिए हे वो भी कम पड़ रहे हे ऊपर से ये गाय का खर्चा अलग आ गया गांव में महाजन के अलावा कोई और नही जो उधार दे सके और महाजन दोबारा कर्जा देता नही वो उसके उसूलों के खिलाफ हे जो उसके खानदानी रिवाज जैसा चला आ रहा है
गांव में उसके रिश्तेदार भी ऐसे नही जो मिलके उसे इतने पैसे दे दे की एक गाय आ जाये..
इत्ता सब सोच ही रहा था कि समधी जी टोकते हुए बोले "कहा खो गए..."
वो निशब्द रहा और उसके समधी खड़े हो गए "में रामपरसाद चाचा के यंहा रूक रहा आज कल सबेरे निकल जाऊंगा फैसला करके बता देना"
उसे समझ नही आ रहा था फैसला किस बात का करना है और न दिया तो क्या होगा अंदेशा था उसे की क्या होगा पर वो नादान बनके उस बारे में सोच भी नही रहा था..।
उसने खाना खाया और आधी रात तक करवटे बदलते रहा
बड़ी बेटी समझदार थी
बो उसके पास आई और बोली
"बापू अब क्या होगा"
"बेटा तू सो जा में हु न"
बापू के उम्मीद भरे शब्द सुन के बो सोने चली गई और बो रात भर करवटे बदलते रहा...
.
सुबह मुर्गा जल्दी उठ गया था लगा उसे ,
वो तो चाहता था थोड़ी और लम्बी हो रात...।
वो सुबह बेलों को चारा डाल रहा था तभी रामपरसाद जी के यंहा से बुलावा आया गया जैसे की उसे उम्मीद थी...
वो माथे में चिंता की लकीरें लेकर निकल पड़ा पीछे पीछे उसकी दो बेटियां भी आ गई
शायद उसके होने वाले समधी ने रामपरसाद जी से पहले ही दहेज की चर्चा कर ली थी उसके पहुचते ही उन्होंने उसे बैठने को कहा और उसके बैठने से पहले ही पूछ बैठे "का हो हरिचरन फिर का सोचे"
बो हाथ जोड़ के बैठ गया उसका चेहरा उसकी स्थिति बंया कर रहा था पर फिर भी बो बोल उठा..
"रामपरसाद जी आप तो बड़े हे और आप ही के सामने तो दहेज की बात हुई थी फिर समधी जी ये नया फरमाइश लेके आ गए , बड़ी मुश्किल से महाजन से पैसे उधार लिए हे वो भी तैयारी में ही खर्च हो गए अब उधार कोन देगा "
उसकी बेचारिगी सी आवाज का असर समधी जी पर रत्ती भर भी नही पड़ा
बो शायद पहले ही सोच लिए थे क्या बोलना हे
"देखिये हरिचरन जी शर्त मंजूर हो तो ठीक नही तो रिश्ता यही खत्म करते हे"
उनके बस इतने ही शब्द काफी थे और बो बोल चुके थे जो बोलना था अब तो हरिचरन को करना था जो करना था ..
"समधी जी दहेज की बात..."
"आप कब तक वही बात लेके बैठे रहेंगे शादी आप कर रहे या पंच और लड़की मेरे यंहा आएगी इन सबके यंहा नही"
हरिचरन की बेटियां बाहर खड़ी देख रही थी ।
अंदर कुछ आवाजे तेज हुई जो उनके पिता की नही थी कुछ गिड़गिड़ाने की आवाजें आयी जो उनकी पहचान की थी तभी उन्होंने देखा जो पिता अपनी बेटियों का सर कभी झुकने नही देता था आज उसकी पगडी किसी के पैरों में रखी थी तभी तमतमाते हुए समधी जी घर से निकले बैलगाड़ी में बैल बांधे और तेजी से निकल गए..
उनका पिता शायद अंदर बैठे सोच रहा था अब अपनी बेटी को क्या जबाब देगा
उसकी लाचारी देख के तो पत्थर भी पिघल जाये..
बड़ी बेटी घर जा चुकी थी और उसकी खबर लेके 5 साल की छोटी बेटी भी रामपरसाद जी के यंहा कुछ ही पलों में आ गई थी
बो चिल्लाई
"बापू दीदी पीछे बाले कुएं में बाल्टी के साथ गिर गई"
....
उसकी बेटी समझदार थी
बाप की पगड़ी उतरते नही देख पाई थी बो।
खुद की शादी की ख़ुशी से ज्यादा उसका ध्यान अपने पिता के माथे की लकीरों में था.....।
.
वो सहसा फिर काँप उठा 15 साल पुराना मंजर जो उसके सामने आ गया था.
पानी अब अधिकतर धान गीली कर चुका था जितना हो सका उसने अपनी पूरी मेहनत लगा के जितनी समेट सकता था उससे ज्यादा धान समेट चूका था..।
वो अपनी झोपडी ले अंदर आ गया और फिर से अपनी सबसे छोटी बेटी की शादी की चिंता करने लगा बाकि बेटियो की शादी तो हँसी ख़ुशी भगवान की मर्जी से हो गई थी पर ये अंतिम शादी उसके गले की नस बनते जा रही थी...!
उसकी छोटी बेटी अकेली अकेली रहती थी अक्सर समाज का उसे ज्यादा ज्ञान नही थी पढ़ने का बचपन से शौक था अभी भी पढ़ ही रही थी उसके साथ की सहेलियों की शादी हो चुकी थी या वो घर में रोटी बनाना सीख रही थी उन सबने बिंदिया से दुरी भी बना ली थी , क्योंकि ये पढ़ने की बात करती थी और बो सब चूल्हा फूंकने की।
अब तो कपड़े की गुड़िया ही उसकी सच्ची सखी थी जिससे बो जो बोलती थी वह हां में सर हिला देती थी..।
अब बो इस चिंता में था कि उसकी बेटी से शादी कोन करेगा और शादी के लिए पैसे को देगा
वो निश्चय कर चुका था जल्द ही अच्छा लड़का देख बिंदिया की शादी करनी है पर बिंदिया के तो पढ़ाई करके पर लग गए थे वो अपने पिता को रोज नई नई नोकरी और पढ़ाई के बारे में जरूर बताती थी और हरिचरन मासूम बच्चे की तरह हां में सर हिलाता रहता था ...।
एक दिन उसके काका का बड़ा लड़का गांव आया हुआ था व्यवहारिकता के नाते उसके यंहा भी बैठने आया
अपने भाई का हाल चाल पूछते हुए उसे पता चला की उसकी सबसे छोटी बेटी अभी कुँवारी हैं
अपने चाचा होने की जिम्मेदारी निभाते हुई उसने अपने भांजे का नाम उससे साझा किया बड़ाई करते हुए।
हरिचरन तो बस ताक में बैठा था
अपनी बेटी का ब्याह करने के लिए,
और रही बात लड़के की तो दूर का ही सही पर भाई गलत सलाह थोड़ी न देगा
शादी को तय करने लड़के का पिता और मामा दोनों आये मामा मध्यस्त का काम कर रहे थे ...
जो हरिचरन का दूर का भाई भी था।
बिंदिया आज शहर गई हुई थी तो हरिचरन मेहमानों को पानी देकर उनके साथ बैठ गया
देख परखने के बाद बात फिर दहेज में आ रुकी
हरिचरन की धान की बर्बादी की खबर पहले ही गांव में फैल चुकी थी ...
इसलिए होने वाले समधी जी पहले निश्चिन्त होना चाहते थे की दहेज मिलेगा की नही ..
उन्होंने मांग रख दी की दहेज की पूरी व्यवस्था हो पहले तभी हम शादी पक्की करेंगे ...।
हरिचरन मौका गवाना नही चाहता था वो महाजन से पैसे उधार लेने के बारे में पहले ही निर्णय ले चुका था
वो झटपट उठा और महमानों को अलविदा कहते हुए बोला
"आप काका के यंहा रुको में सूरज ढलते तक आपको बता दूंगा"
उसके शब्दो में उमंग थी और आशा की एक किरण की अब मेरी बेटी की शादी हो ही जायेगी
वो टूटी चप्पल टांग के महाजन के घर जा पहुँचा
15 सालों बाद फिर उसे महाजन की याद आई थी । स्थिति अब काफी बदल चुकी थी अब महाजनी का काम अगली पीढ़ी देखने लगी थी वो पहले की पीढ़ी से ज्यादा पढ़ी लिखी थी पर उनके स्वभाव में रत्ती भर का भी अंतर नही था..।
हरिचरन को देखते ही महाजन खुश हुआ क्योंकि उसके पास बकरा खुद आया था हलाल होने
हरिचरन पहुचते ही एक साँस में सबकुछ बोल चूका था और " साहेब बेटी का ब्याह हो जायेगा आपकी दया से तो पूण्य आपको भी मिलेगा" कहते हुए उसने अपनी बात खत्म कर दी
लेकिन महाजन और कुछ चाहता था उसकी नजर हरिचरन की उपजाऊ जमीन पर थी और इससे अच्छा मौका शायद ही उसे कभी और मिलता वो झट से बोल पड़ा
"काकाजी देखिये आप बड़े हे हमसे और समझदार भी अब क्या है आपकी तो ये आखिरी बेटी है इसका ब्याह करके आप तर जाओगे"
हरिचरन समझ नही पाया कुछ पर हामी में सर हिला दिया
"उधारी का ऐसा हे हम दे देंगे पर आपकी धान इस बार खराब हो गई इंद्र आजकल नाराज चल रहे हे कुछ सालों से उम्र बीत जायेगी आपको ब्याज भरते भरते वैसे भी बची ही कम है"
हरिचरन मंसा भाप चूका था बो बीच में बोल उठा
"साहेब दिक्कत कोई नही होगी बस इस बार उधार दे दिजिये में पक्का आपका पैसा ब्याज समेत लौटा दूंगा"
महाजन चिढ़ के बोला
"काका समझो बात को वो जमीन हे तुम्हारी हमारे खेत के पास वाली उसे बेच दो हम अच्छे दाम में खरीद लेंगे शादी भी हो जायेगी और तुम कर्जे में भी नही डूबोगे"
महाजन के रुख बदलते देख हरिचरन गिड़गिड़ाने लगा क्योंकि जरूरत तो उसकी थी ।
जिस जमीन ने जसे अन्न दिया आज उसे वो भला कैसे बेच सकता था
महाजन उसे ज्यादा सोचने का वक्त नही देना चाहता था वो फिर बोला
"जमीन दो पैसे ले जाओ वैसे भी उधार लेने के लिए बंजर जमीन रख रहे गिरवी उसमे तो पत्थर के सिवा कुछ नही होता
अगर करनी है शादी तो जल्दी फैसला करो मुझे शहर भी निकलना हे"
हरिचरन पगड़ी महाजन के कदमो में रखते हुए वो बोला
"साहेब उस जमीन से पेट पाला हे मेने खुद का और बच्चों का उसे ऐसे कैसे बेच सकता हु"
अब तक महाजन तमतमा चूका था बो पगड़ी को लात मार के अपनी बात इशारो में ही कह चूक था जो कोई अनपढ़ भी समझ सकता था....।
तभी महाजन के दरवाजे पे बिंदिया ने दस्तक दी अपने पिता को पगड़ी उतारके गिड़गिड़ाते हुए बो दूसरी बार देख रही थी पहली बार तो समझ नही पाई थी पर अब उसे अब समझ आता था
उसने अपने पिता को हाथों से उठाया..
हरिचरन लगातार अपनी किश्मत को कोस रहा था..!
तभी बिंदिया बोल उठी
"बापू आपको एक ख़ुशख़बरी देनी है
मेरी नोकरी लग गई कलेक्ट्रेट ऑफिस में वँहा बाबु का काम रहेगा सरकारी नोकरी हे 25000 रूपये मिलेंगे हर महीने अब आपको गिड़गिड़ाने की जरूरत नही और मेरी शादी को चिंता भी करने की जरूरत नही ...."
हरिचरन अबोध बालक की तरह सुन रहा था उसे इस बार भी अपनी बेटी की बात समझ नही आ रही थी उसे इन सब बातो में बस सरकारी नोकरी और 25000 रूपये समझ आया था
सरकारी नोकरी के नाम पे उसे बस पटवारी जिसे लोग सामने से इज्जत देके पीठ पीछे कोसते थे और दूसरा स्कुल का मास्टर जिसे लोग सामने से भी और पीठ पीछे भी इज्जत देते थे पता था..। पर वो खुश था आखिर उसकी ये बेटी समझदार तो निकली जिसे वो सबसे नादान समझता था आज उसके सर पे बोझ होके भी बोझ नही लग रहा था.....।
इस बार महाजन हरिचरन को हीनता की नजरों से न देख के जलन की नजरों से देख रहा था...
और हरिचरन उसके घर से सर उठा के निकल गया......।
सब्र और समझ
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