Wednesday, June 6, 2018

मिहरिमह (moon light)

अमावस्या की रात थी, घनघोर वर्षा हो रही थी एक छोटे  से कस्बे में पूरा मोहल्ला कानाफूसी में लगा था।
तभी एक घर के अंदर से खबर आई कि शायद होने वाला शिशु जिंदा न बच पाए।
मोहल्ले के लोगों में कानाफूसी बढ़ गयी।
लोग अल्लहा से मिन्नतें कर रहें थे कि वो बच जाए।
तभी अंदर से एक अच्छी खबर आई,
बच्ची हुई थी वो भी सही सलामत।
कुछ देर की शांति के बाद फिर मोहल्ले के लोगों में कानाफूसी शुरू होती है ।ये मोहम्मद आमिर की तीसरी बेटी थी इससे पहले उनकी दो बेटी औऱ 5 और 3 साल की थी।
मोहम्मद आमिर अपनी दोनों बेटियों से बेहद प्यार करते थे, पर पुत्रमोह से भी ग्रसित थे..!

आज वो करिश्मा हुआ है जो होना मुश्किल था, लग रहा था होने वाला शिशु इस अमावस्या की रात के अंधेरे में ही गुम जाएगा, पर वो जन्मा चमकते हुए बिल्कुल चांद सा।
मोहम्मद आमिर ने अपनी बेटी का नाम मिहरिमह रखा जिसका मतलब चांदनी, चांद का प्रकाश होता है।
मिहरिमह घर मे छोटी थी पर सबसे छोटी बस वो ढाई साल ही रह पायी फिर उसका भाई आ गया जिसका इंतजार उसके अम्मी अब्बू को काफी अर्से से था।
वक्त जल्दी जल्दी बीत रहा था
मिहरिमह अब 8 साल की हो गई थी, थोड़ी समझदार भी।
मिहरिमाह के अब्बू उसे स्कूल भेजते थे, उस छोटे कस्बे में बच्चियों को बस घर के काम करने सिखाये जाते थे उसकी दोनों बहनें भी कभी स्कूल नहीं गई थी।
तब मास्टर उस एकलौती लड़की को स्कूल में आते देख थोड़ा अचंभित होता था।
उसे एक तरफ दूर बैठाया जाता  और उससे न सवाल पूछा जाता न उसका होमवर्क देखा जाता।
एक दिन वो मास्टर से लड़ ली
"मासाब आप हमें पढ़ाते क्यों नहीं , हम तो इन सबसे भी होशियार हैं जिन्हें लिखना नहीं आता उन्हें शाबासी देते हो हमें क्यों नहीं?!
मासूमियत और रोष से पुछे गए सवाल को उस मास्टर ने नजरअंदाज कर दिया।
ये देख के मिहरिमह को और गुस्सा आया और वो मास्टर के सामने खड़े हो गई और होमवर्क चेक करवाने की ज़िद करने लगी।
उस छोटी बच्ची के सवाल पूछने और तेज आवाज में बात करने को लेकर मास्टर को गुस्सा आया और उसने मिहरिमह की कॉपी लेकर उसमें 1 से 1000 तक कि गिनती लिखके लाने को कहा और साथ में ये भी कहा कि
"अगर ये नहीं हुआ तो कल से मत आना"

मिहरिमह ज़िद में बात मान गई और घर चली आयी।
अब्बा को सारी बात बताके कहा कि मुझें शाबासी चाहिए और स्कूल की सारी बातें अपने अब्बा को बता दी। ये सब सुनने के बाद उसके अब्बा बोले
"मिहरिमह जो तुझें नहीं मिल सकता उसके पीछे ही क्यों भागती है"

मिहरिमाह बस इतना बोली
"मुझें तो जिंदगी भी नहीं मिलने वाली थी पर मिल गई ना"

छोटी बच्ची का करारा जबाब सुन के मोहम्मद आमिर स्तब्ध हो गए
और उन्होंने ने रात भर उसके साथ जाग के 1 से 1000 तक गिनती लिखवाई और सुबह मिहरिमाह ने शाबासी भी पाई।

वक्त बीता
मिहरिमह अब 12 वीं भी पास कर गई थी इसके बाद कि पढ़ाई करवाने की उसके अब्बू की न हैसियत थी न ही मर्ज़ी
अपनी दो बेटीयों की शादी एक साथ करवा चुके मोहम्मद आमिर एक दो साल बाद आयसा की भी शादी करवाना चाहते थे पर मिहरिमह के सपने तो कुछ और ही थे।
उसकी अम्मी उसे बार बार कहती "मिहरिमह जो तुझें नहीं मिल सकता उसके पीछे ही क्यों भागती है"

पर मिहरिमह अम्मी कि बात नजरअंदाज कर देती थी 

और कहती थी
"अम्मी  मेरे नाम का मतलब पता है तुम्हें, बस वैसे ही चमकना है मुझें"
मिहरिमह को फिल्मों में जाना था
वो मोहल्ले में और स्कूल में अपनी सहेलियों के सामने  एक्टिंग करती और उन सबकी तालियां बटोरती और खुशी से नाचती थी।
तारीफों से उसकी आंखों में एक अलग चमक दिखती थी।

इसी बीच मिहरिमह की जिंदगी में एक हादसा हुआ उसके अब्बू
मोहम्मद आमिर एक्सीडेंट के शिकार हो गए थे, बुरे तरह से ज़ख्मी आमिर को अस्पताल ले जाया गया। ऊपरी इलाज के बाद डॉक्टर ने मोहम्मद आमिर कि पत्नी को बताया कि इनका ऑपरेशन करना पड़ेगा जिसका कुल खर्च एक लाख आएगा।
तब तक उनकी दोनों बेटियां भी आ गई थी।
मोहम्मद आमिर की पत्नी और दोनों दामाद ने खर्चे को लेकर चर्चा कर कुछ तय कर लिया था जिससे मिहरिमह अनजान थी।
इसी बीच उसकी अम्मी ने उसका परिचय उसके दूर के मामू से करवाया जिन्हें उसने पहले कभी नहीं देखा था।मिहरिमह की अम्मी ने उससे कहा
"ये इख्तियार मामू हैं मुंबई में रहते हैं, फिल्मों में लोगो को काम भी दिलाते हैं, तुम्हें फिल्मों में जाना है न इनके साथ मुंबई चली जाओ"

इतना सुनते ही मिहरिमह चमक उठी पर कुछ देर बाद ही वो बोली
"पर अब्बा...."
मिहरिमह की माँ उसकी बात काटते हुए बोली
"अब्बा की फिक्र मत करो उनका ऑपरेशन होने वाला है वे ठीक हो जाएंगे मगर ये मौका तुमसे छुटा तो दोबारा नहीं मिलेगा"

अम्मी की बात मान के मिहरिमह जाने के लिए तैयार हो गयी
उसे फिर वही मिल रहा था जिसे सब कहते थे नहीं मिल सकता।
उसे खुशी थी कि
उसने सबको गलत साबित करके जिंदगी ली, शाबासी ली और बहुत कुछ अब एक और मंजिल वो हासिल करने वाली थी।
सब से विदा लेकर वो अपने नए नवेले मामा के साथ मुंबई आ गई।

मुंबई में उतरते ही उसके चेहरे की चमक उसके नाम सी बढ़ गई ।
बड़ी बड़ी बिल्डिंग इतनी भीड़ भाड़ सब कुछ उसके लिए नया था।
रेलवे स्टेशन से निकलते ही उसके मामा उसको लेकर
एक मोहल्ले में ले गए। वो बस बड़े शहर के नज़ारे देखते हुए  उनके साथ चल रही थी।

उस मोहल्ले में जाते ही उसने मामा से पूछा
"मामू हम ये कंहा आ गए"

मामू ने एक कुटिल मुस्कान चेहरे पर लाते हुये कहा

"वहीं जंहा तुम्हें अपनी कला दिखानी है"

मिहरिमह मुँह बनाते हुए बोली
"ये फ़िल्म इंडस्ट्री हैं, यंहा बनती हैं क्या फिल्में"

उसके मामू ने कुछ जबाब नहीं दिया
बस चेहरे पर एक मुस्कान लिए हुए चलते रहे।

मिहरिमह तुंरत में कुछ नहीं समझ पाई पर जैसे जैसे मोहल्ले की गहराई में जाती रही सब कुछ  समझती रही।
वो गलत हाथों में आ गई थी, उसे अब समझ आ रहा था कि उसके अब्बू के इलाज के पैसे कंहा से आये और ये नये नवेले मामू उसे कंहा और किस लिए लेकर आये हैं...

उसके रोंगटे खड़े हो गई वो उसके मामू की उल्टी दिशा में तेजी से भागी पर उनके साथियों के हाथ कुछ देर में ही पकड़ी गई।
"कर ली कोशिश, हो गई तसल्ली चलो अब चुपचाप मैरे पीछे पीछे आओ" इख़्तियार ने कहा ।
अब उसके पास सिर्फ एक ही रास्ता था जो कि उसके मामू के पीछे पीछे जाता था, वो बहुत दूर निकल के आ गई थी जंहा से उसका वापिस जाना नामुमकिन था।
वो सहती रही और कोशिश भी करती रही वँहा से निकलने की पर हर बार असफल रही।

एक दिन उसके "परमानेंट ग्राहक" ने उससे पूछा
"बोल मिहरिमह तुझें क्या चाहिए"

मिहरिमह बोली
"मौत"

उसके कानों में एक आवाज़ गूंजी
"मिहरिमह जो तुझें नहीं मिल सकता उसके पीछे ही क्यों भागती है"
उसे अब खुद के नाम से घृणा होने लगी थी। वो सोचते रहती थी काश जन्म के समय ही अमावस्या के अंधेरे में वो समा जाती।
जिंदगी उसकी अब उसके नाम के उलट जो हो गई थी.....

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