Wednesday, September 20, 2017

प्रेम

तुम कौन हो..?
क्यूँ हो.. ?
किस लिए हो..?
जैसी भी हो वैसी क्यों हो..?
क्या कभी सोचा है मेने तुम्हारे बारे में तुमसे मिलने से पहले..?
क्या मुमकिन है तुम्हे सोचना..?
कैसे मुमकिन है तुम तो कल्पना से परे हो
तुम्हारी नादानियां सबसे अलग है
तुम्हारी समझदारी कई बार मुझे अचंभित कर देती हैं..!
इतनी समझदार हो फिर लापरवाही कैसे कर लेती हो
हां तुम इंसान ही हो!!
तुम गलतियां भी करती हो
पर उन गलतियों में गुस्सा कैसे आ सकता है किसी को ,
बस ढोंग किया जा सकता है...!!
तुम इतनी अच्छी क्यों हो
या मुझे लगती हो..!
हां दुसरो को अच्छी क्यों लगोगी वो तुमसे प्रेम थोड़ी न करते हैं, पर प्रेम करता हु इसलिए अच्छी लगती हो...?
नही नही ऐसा नही है
तुम हो ही अच्छी..!
बस दूसरे तुम्हे जानते नही..।
क्या में तुम्हे जानने लगा हूं...?
हां , पर पूरा नही...
कितना विरोधाभाष है न किसी को पूरा न जानते हुए भी उसे जानने का दावा करना....!
पर तुम्हे कोई कैसे पूरा जान सकता है जिसने बनाया उसके लिए भी मुश्किल हो तुम्हे जानना..!
क्या हम जुड़े हैं एक दूसरे से...?
हां कितने करीब तो है हमारे दिल एक दूसरे से....!
तुम्हे सोच के लिखता हूं तो
जो जो सोचता हूं पूरा लिख हि नही पाता शब्दों की कमी हो जाती है..!
कभी मन करता है बारिश में भीगु तुम्हारे  साथ ...!
कभी लगता है सुबह हो मेरी तुम्हारे साथ ..!
तुमसे ज़िद बेफिक्र होकर कर लेता हूं..!
प्यार तुम्हे बेइंतिहा करता हूं...!
गुस्सा कभी कभी हद कर लेता हूं.....!
इतने हसीन पल हे तुम्हारे साथ गिन नही सकता..!
कितना इश्क हे तुमसे बता नही सकता..
कभी मन करता है चिल्ला के कहु "हां प्यार है तुमसे"
फिर लगता हे धीरे से तुम्हारे कान में कहुँ
"हां प्यार है तुमसे"
ताकि तुम्हारे दिल की धड़कन भी महसूस कर पाऊ..!
खुद के सवालों के जबाब में उलझ जाता हूं..!
जब सवाल तुम्हारे ऊपर होते है....!

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